unlawful law
आज कल एक ख़बर बहुत ही चर्चा में हैं हर न्यूज़ चैनल हर समाचार से सम्बंधित सामग्री इसी से भरी हुई हैं कभी अखबार के पहले पेज पे जगह बनाई तो कभी धीरे धीरे अन्दर के पन्नो पे सरक जाएगी वो समाचार है एस एस पि राठौर की और रुचिका गिर्होत्र की ये घटना आज से उन्नीस बरस पहले हुई थी एक वासना में अंधे आदमी ने अपनी उम्र की आधी से भी कम या कहे तो बेटी के बराबर की लड़की के साथ ग़लत आचरण किया ये बहुत ही सर्मिन्दा और लज्जित करने वाली घटना थी ये नही है की ये पहली और अकेली घटना हो जिसने इंसानियत को कलंकित किया हो इससे भी ग़लत और रूह को दहलाने वाली घटनाये हुई है लेकिन ये तुलना करने वाली बात तो है नही हर ग़लत कार्य ग़लत होता है और अपने आप में अकेला होता है हम निठारी को कैसे भूल सकते है
ये इसलिए ग़लत नही है की एक वासना में डूबे आदमी ने एक मासूम लड़की के साथ ग़लत वयवहार किया बल्कि इसलिए की वो व्यक्ति एक ऊचे पद पर था और एक ऊचे पद पर बैठे व्यक्ति की दोहरी जिम्मेदारी होती है की वो अपने आचरण और वयवहार से सामाजिक जीवन और निजी जीवन में एक आदर्स स्थापित करे परन्तु इस व्यक्ति ने सारी मर्यादा भुला दी परन्तु इस सब के लिए अकेला वह व्यक्ति ही नही बल्कि हमारी सारी व्यवस्था ही जिम्मेदार है ये आश्चर्यचकित करती है की कैसे उस व्यक्ति ने अपने पद का दुरुप्रयोग करते हुए इस केस को दबाने की कोसिस की कैसे उसने उसके परिवार और उसके दोस्तों को प्रतारित किया उसके भाई को जबरदस्ती ठाणे वुल्वाया उसे पीता उसे धमकी दी और केस वापस लेने की धमकी दी
इससे भी dukhad तो ये है की हमारी nayay vayavstha कितनी lachar और nirih है उसे एक केस में nirnay देने में उन्नीस वर्ष लग गए और वो भी nirnay दिया तो adha adhura और वो व्यक्ति दस minute में ही jamanat लेकर besarma hasi लेकर निकल गया वो तो bhala हो मीडिया valo का की उन्होंने इसे gambhirta से लिया और एक aandolan की तरह चलाया